अमीर मीनाई
अमीर मीनाई (अमीर अहमद मीनाई; जन्म लखनऊ, जन्म-वर्ष विवादित — 1828 या 1829; इंतक़ाल 1900, हैदराबाद) उन्नीसवीं सदी के उर्दू शायर, प्रसिद्ध नातगो और कोषकार थे। सूफ़ी बुज़ुर्ग शाह मीना के ख़ानदान से थे — जिनके लखनऊ स्थित दरगाह के इर्द-गिर्द सदियों से मीनाई बस्ती बसी थी — और फ़रंगी महल में तालीम पाए। अवध की अदालत में उच्च पद पर रहे; 1857 के बाद रामपुर के नवाब यूसुफ़ अली ख़ाँ के दरबार में पनाह मिली, जहाँ उन्हें शाही पुस्तकालय का प्रमुख और ग़ालिब के बाद नवाब का उस्ताद बनाया गया। उर्दू, फ़ारसी और अरबी तीनों में लिखते थे। उनकी ग़ज़ल 'सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता' आज भी गाई जाती है; उनकी नातों ने इस विधा में नई जान डाली। उनका महान कार्य 'अमीर-उल-लुग़त' — उर्दू से उर्दू का व्यापक कोष — नियोजित आठ जिल्दों में से केवल दो (1891–92) छप सका।
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