प्रो. शमीम हनफ़ी
प्रसिद्ध भारतीय उर्दू आलोचक, नाटककार और साहित्यिक इतिहासकार। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व प्रोफेसर एमेरिटस।
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Ghazals by प्रो. शमीम हनफ़ी
View All 2 Ghazalsख़ामोशी के दरमियान
रोशनी की तलाश
Nazms by प्रो. शमीम हनफ़ी
View All 2 Nazmsदिल्ली की शाम
वक़्त का सफ़र
Famous Couplets (اشعار • लोकप्रिय अशआर)
View All 4 CoupletsRubaiyat (رباعیات) by प्रो. शमीम हनफ़ी
View All 2 Rubaiyatख़याल-ए-दोस्त
हर सुबह नया इक पैग़ाम लाती है हर शाम दिलों को आराम लाती है ख़ामोश निगाहों में बसा है जो दर्द वो याद हर एक रोज़ बनाम लाती है
सहर का पैग़ाम
ज़ुल्मत में भी उम्मीद की किरन बाक़ी है दिल में अभी एहसास-ए-वतन बाक़ी है उलझे हैं अगरचे ख़ार राहों में मगर दमके हुए फूलों का चमन बाक़ी है
Qita (قطعات) by प्रो. शमीम हनफ़ी
View All 2 Qitaफ़िक्र-ओ-आगही
फ़िक्र की शमा जलाए हुए हम गुज़रे हैं ज़ुल्मत-ए-शब को मिटाए हुए हम गुज़रे हैं हर नए मोड़ पे तारीख़ ने पहचाना है आदमियत को बचाए हुए हम गुज़रे हैं
अदब का रंग
अदब की रूह में सच्चाई का नूर होता है जहां भी जाए दिलों को सुरूर होता है जो लफ़्ज़ दिल से निकलता है असर रखता है वो चाहे शब हो कि सेहर बदस्तूर होता है
English Poetry by प्रो. शमीम हनफ़ी
View All 1 English Poetryख़ामोशी की गूंज
ख़ामोशी के दरमियान इक पुरसुकून गुफ़्तगू ने पर तोले जब तारीकी ने ज़मीन को घेरा, तब भी इक ख़ुफ़िया रोशनी थी अल्फ़ाज़ ने ख़ामोशी अख़्तियार की, लेकिन मानी रात भर बोलते रहे मेरी अपनी ही रूह के साथ, इक अनोखा गीत गूंज उठा